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  • चट्टान सी खड़ी रही मुसीबतें,
    वर्चस्व सागर की लहरें बन टकराता रहा।
    कठोर छाती ढकेल देती वापस मुझे,
    बटोर हिम्मत वर्चस्व बार-बार वापिस आता रहा।
    धूल धुल गई जब सच के आइने से,
    वर्चस्व कोशिशों का असर रंग दिखाता रहा।
    टूट रहा था वो पत्थर भी धीरे-धीरे,
    साध निशाना वर्चस्व वार हर बार बरसाता रहा।
    बिखर रहा था वो इस चोट से ज़र्रा-ज़र्रा,
    देख साहिल वर्चस्व उस पार रास्ता बनाता रहा।
    कट गया पत्थर मेरी रुकावटों का,
    धुन उमंग के गीतों की वर्चस्व गाता रहा।
    चट्टान सी खड़ी रही मुसीबतें
    वर्चस्व सागर की लहरें बन टकराता रहा।
    वर्चस्व की कलम से ....... #
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